History of guns
बंदूक का इतिहास
बंदूक का इतिहास

हेलो दोस्तों , टेक्नोलॉजी में थोड़े थोड़े समय में लगातार बदलाव आता ही रहता हे । और ये हमारे हथियार में भी देखने को मिलते हे । आज के ब्लॉग पोस्ट में हम इन्ही मेसे एक बंदूक का इतिहास जानने की कोशिश करेंगे ।

आज के ब्लगपोस्ट में हम जानेंगे की बंदूक क्या होती हे और कैसे काम करती हे? जानेंगे की इसके पीछे क्या विज्ञानं हे । और सबसे महत्वपूर्ण बंदूक का इतिहास क्या हे और कैसे इसकी तकनीक में बदलाव आये ये जानने की कोशिश करेंगे जो काफी दिलचस्प होने वाला हे । तो आगे जरूर पढ़ते रहिये ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

बंदूक क्या है और कैसे काम करती हे?

बंदूक वास्तव में एक ट्यूब(नली) होती हे जिसके पीछे का सिरा बंध होता हे और आगे का सिरा खुला होता हे । आगे के सिरे से गोली या गेंद जैसी घातक चीजे रखी जा सकती हे और इसके पीछे विस्फोटक पदार्थ रखा जाता हे । इस पदार्थ के विस्फोट होने से रखी हुई घातक चीज जैसे गोली को धक्का मिलता हे जिससे ये नली आगे के सिरे से तेज गति से बाहर निकलती हे ।

तोपों की गोली
तोपों की गोली

आपने देखा होगा की मध्यकालीन समय में भी समुद्री डाकू भी इसी सिद्धांत का उपयोग करके तोप चलाते थे । बारूद के आगे लोहे के बड़े गोले रखकर बारूद को जलाकर विस्फोट किया जाता था । आज के आधुनिक समय में बारूद और गोले का स्वरुप गोली ने ले लिया हे । (Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

बारूद और एक गेंद को ट्यूब में पैक करने के बजाय, गोली में पाउडर() और बुलेट को मिला दिया जाता है ।

बंदूक कैसे काम करती हे?

मूल रूप से, बंदूक का विचार उच्च दबाव वाली गैसों का निर्माण करना है जो शूटिंग वस्तु को एक निश्चित दिशा में धकेलते हैं ।

आइए आधुनिक बंदूक(पिस्तौल) के सबसे महत्वपूर्ण भागों पर एक नज़र डालें, Rear sight हथियार के ऊपरी भाग में स्थित है।हैमर स्पर को अक्सर केवल हैमर कहा जाता है । Rear sight में फायरिंग पिन(Firing pin) होता है जिस पर ट्रिगर दबाने पर हैमर हिट करता है । बंदूक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बैरल है।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

ट्रिगर को खींचने से बंदूक को सियर की गति के माध्यम से फायर किया जाएगा । इसके लिए हैमर स्ट्रट(hammer strut) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

बंदूक का डिजाइन
बंदूक का डिजाइन

अगर पिस्टल अनकॉक्ड और अनलोड है तो Rear sight को पहले हाथ से पिस्टल में पीछे खींचा जाता हे । जब Rear sight हाथ से पीछे की ओर चली जाती है, तो हथौड़े को उठा लिया जाता है। सीयर हथौड़े को लगता है।

जब Rear sight को पीछे की ओर धकेला जाता है तो यह बैरल को भी पीछे की ओर धकेलता है। यह कारतूस(गोली) को बैरल में आसानी से स्लाइड करने की अनुमति देता हे ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

जैसे ही Rear sight को खींचकर छोड़ा जाता है, टेंशन रिकॉइल स्प्रिंग स्लाइड को आगे की ओर धकेलता है। Rear sight कारतूस(गोली) को अपने साथ ले जाती है और गन बैरल में धकेल देती है । हैमर उठा हुआ रहता है , सीर की वजह से । बंदूक की बैरल अपनी प्रारंभिक स्थिति में वापस आ जाती है बंदूक अब लोड और कॉक्ड है।

Grip सेफ्टी गन को फायरिंग से तभी रोकता है जब गन ग्रिप को हाथ से पकड़ लिया जाता है । जब फायरिंग पिन(Firing pin) प्राइमर(primer) से टकराती है तो यह Cartridge में गनपाउडर(बारूद) को प्रज्वलित करता है।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

cartridge में गनपाउडर(बारूद) के प्रज्वलित होने के बाद, बुलेट आगे बढ़ता है और दबाव द्वारा स्लाइड को पीछे धकेला जाता है । फलस्वरूप केस (Cartridge का भाग) को बाहर निकाल दिया जाता है और बैरल में एक नया कारतूस(गोली) डाला जाता है। ट्रिगर करते ही हैमर अपने आप कॉक हो जाता है । बंदूक फिर से चलाई जा सकती है ।

बंदूकों का तेजी से टेक्नोलॉजिकल विकास इनके प्रकार और उनके मूल घटकों को देखना कठिन बना देता है । आज के ज़माने कई प्रकार की बंदूक देखने को मिल जाती हे । आज की बंदूके ऐसी हैं जो 30 या अधिक गोलियां मैगज़ीन में रखा सकती हे , या एक बैरल से अधिक रखने में सक्षम हैं, या ट्रिगर के एक बार दबाने से एक से अधिक गोली चला सकती हैं ।

आज बंदूक में आप निशाना लगाने के लिए राइफल स्कोप, टोर्च, लेज़र, बाइपोड जैसी अन्य चीजे भी बंदूक के साथ जोड़ सकते हो । आज की आधुनिक बदुँके इतनी सरलता से काम करती हे पर फिर भी इसकी टेक्नोलॉजी में नए नए बदलाव होते ही रहते हे ।

बंदूक कितने प्रकार की होती हे? टोटल मुख्य 6 प्रकार की बंदूके देखने को मिलती हे जिसमे बंदूकों के नाम राइफल (Rifles),शॉटगन (Shotguns),हैंडगन (Handguns), रिवॉल्वर (Revolvers),पिस्तौल (Pistols) और मशीन गन (Machine Guns) को शामिल किया जाता हे । बंदूकों के नाम और फोटो ऊपर दिये गए हे ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

शॉटगन बड़ी लम्बे बैरल वाली बंदूके हे । जो एक ट्रिगर खींचने पर एक गोली की जगह पर बड़ी मात्रा में एक साथ छोटे स्टील या छर्रे फायर करती हे । सेमीऑटोमेटिक शॉटगन की रेंज (गोली की दुरी ) 45 मीटर तक होती हे ।

रिवॉल्वर एक हैंडगन हे जिसमे घूमने वाला सिलेंडर होता हे । सिलेंडर में 7 गोलिया राखी जा सकती हे । ट्रिगर के प्रत्येक पुल्ल से एक गोली निकलती हे और लोडिंग अपने आप होती हे । इसलिए इसे सेमि आटोमेटिक गन कहा जाता हे । रिवॉल्वर की रेंज (गोली की दुरी ) 200 मीटर तक होती हे ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

पिस्तौल और रेवोल्वर में क्या अंतर होता है? पिस्तौल भी एक हैंडगन हे पर इसमें रिवॉल्वर की तरह सिलिंडर का उपयोग नहीं होता हे । ये भी सेमि ऑटोमेटिक कहलाते हे जिसमे गोलिआ पिस्तौल की ग्रीप में मैगज़ीन में स्थित हे ।आधुनिक पिस्तौल एक मैगजीन में 17 राउंड तक ले जा सकते हैं ।

पिस्तौल की रेंज (गोली की दुरी ) 100 मीटर तक होती हे ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

राइफल की गोली कितनी दूर तक जाती है? राइफल एक लंबी, शक्तिशाली बंदूक है जिसे कंधे से दागा जाता है। एक सैनिक सबसे अधिक बार राइफल का इस्तेमाल करता हे । राइफल की बुलेट की दुरी 300 मीटर से 4000 से 5000 मीटर तक हो सकती हे । जिसका आधार कारतूस के आकार , बैरल , शूटिंग का एंगल , ऊंचाई जैसे कारको पर होता हे ।

मशीन गन को ऑटोमेटिक हथियार माना जाता हे । जिससे बहुत ही तेजी से लगातार फायर किया जा सकता हे । मशीन गन बेल्ट-प्रोपेल्ड हथियार हैं जो प्रति मिनट 500 से 1,000 राउंड फायर करते हैं । ये तब तक फायर करते हे जब तक ट्रिगर को खींच लिया जाये या कारतूस गोलिया ख़तम हो जाये । इसकी रेंज 200 मीटर के आसपास रहती हे ।

बंदूक कैसे काम करती हे और कोन से प्रकार की होती हे या जानने के बाद अब हम जानते हे की इस बंदूक का इतिहास क्या हे और इसकी शुरुआत कहा से और कैसे हुई ?

बंदूक का इतिहास क्या हे और इसकी शुरुआत कैसे हुई ?

हजारो सालो से बंदूक का उपयोग मानव के द्वारा किया जा रहा हे । एक ऐसी टेक्नोलॉजी का उद्भव जिसने कई लोगो के जीवन को हकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरीके से प्रभावित किया । लेकिन बंदूक का इतिहास 9 वि सदी के शुरुआत से माना जाता हे जब गनपाउडर यानि की बारूद का आविष्कार हुआ था । चलिए जानते हे ।

बारूद (gunpowder) का आविष्कार

गनपाउडर दुनिया का पहला विस्फोटक था । और इसका आविष्कार एकदम आकस्मिक रहा । चीनी भिक्षुओं ने लगभग 9वीं शताब्दी ईस्वी में जीवन को बढ़ाने के इरादे से अमृत (युवाओं का फव्वारा) की खोज के दौरान गलती से गनपाउडर तकनीक की खोज की ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

gun powder
gun powder

पोटेशियम नाइट्रेट, सल्फर और चारकोल का मिश्रण से एक पाउडर का निर्माण हुआ जो तेजी से जलता था और विस्फोटक था । रसायन शास्त्र में गनपाउडर का महान ऐतिहासिक महत्व का है ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

10 वि सदी में चाइना में युद्ध में उपयोग के लिए एक बंदूक के सिद्धांत पर काम करने वाला हथियार भी बनाया गया । जिसमे बांस की लकड़ी के अंदर पीछे बारूद और आगे तीर डालकर पीछे से बारूद जलाकर तीर को छोड़ा जाने लगा ।

Chinese bamboo gun
Chinese bamboo gun
Fire lance
Fire lance

इसके आलावा मंगोलो के हमले के दौरान चीनियों ने गनपाउडर का उपयोग आग के तीर, बम और फायर लांस जैसे हथियारों में युद्ध के दरमियान किया । पहली तोपों और हथगोले सहित, अगली शताब्दियों में चीनियों ने मंगोलों के खिलाफ कई प्रकार के हथियारों को सिद्ध करने के बाद अधिक बारूद-आधारित हथियारों को इस्तेमाल किया।

यह बिल्कुल स्पष्ट नहीं है कि गन पाउडर यूरोप में कब आया , लेकिन कुछ लोगो का केहना है कि यह 13 वीं शताब्दी में मध्य एशिया के माध्यम से सिल्क रोड व्यापार मार्गों पर आया था ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

प्रतिद्वंद्वी देशों ने इष्टतम मिश्रण पर पहुंचने से पहले आने वाली शताब्दियों में बारूद के व्यंजनों से विधि पून;निर्माण किया: लगभग 75 प्रतिशत पोटेशियम नाइट्रेट, 15 प्रतिशत चारकोल और 10 प्रतिशत सल्फर के साथ ।

जैसे-जैसे सदियां जारी रहीं, नई और बेहतर तोपों को डिजाइन किया गया । हाथ के गोले की ये पहली वास्तविक व्यक्तिगत बन्दूक थी ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

मैचलॉक सिस्टम गन (Matchlock system gun) :

लेकिन 15वीं शताब्दी से पहले, बंदूकें चलाना मुश्किल था – पाउडर को प्रज्वलित करने के लिए उन्हें दोनों हाथों और एक जलती हुई बाती की आवश्यकता होती थी । उसके 15 सदी में लॉक सिस्टम का आविष्कार हुआ । एक आंतरिक फायरिंग तंत्र जिसने हाथ से पकड़े गए बन्दूक की शूटिंग को अधिक कुशल, आसान और सुरक्षित बना दिया ।

बंदूक के आविष्कारक कौन है? बंदूक का आविष्कार कब और किसने किया? मैचलोक सिस्टम 15 वि सदी में सबसे पेहली यांत्रिक बंदूक थी । जिसका आविष्कार यूरोप में पोर्टुगीस लोगो के द्वारा माना जाता हे । जिसमे इसमें एक S -आकार का हाथ होता है, जिसे एक सर्पिन कहा जाता है, जिसमें एक सुतली (रस्सी) होती थी ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

Matchlock system
Matchlock system

एक ट्रिगर डिवाइस होता है जो सर्पिन को निचे करता है ताकि जली हुई सुतली(रस्सी) बैरल के किनारे से जुड़े पैन में प्राइमिंग पाउडर को आग लगा दे ।

इस तकनीक ने फायरिंग के समय हथियार पर एक मजबूत पकड़ रखने के लिए दोनों हाथों को मुक्त रखना संभव बना दिया, और जिससे महत्वपूर्ण बात यह है कि शूटर की निगाहें लक्ष्य पर टिकी रहे । मैचलॉक गन में हारक्यूबस, हैक्यूबट, हैगबट, हैचबस, कैलीवर और मस्कट जैसे कई नाम थे ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

इसकी कमजोरिआ भी थी जैसे matchlock सिस्टम में सुतली को जलाये रखने की आवश्यकता थी । मैच सुतली को लंबे समय तक जलाए रखने के लिए इसे पोटेशियम नाइट्रेट में डुबोया जाता था । इसकी मुख्य समस्या ये थी की हवा या बारिश में जली हुई सुतली का उपयोग करना मुश्किल था, और इसकी चमक ने रात में दुश्मन से एक खतरा खड़ा करता था ।

Matchlock gun
Matchlock gun

हालाँकि 100 साल तक मैचलॉक गन यूरोप में प्राथमिक सैन्य आग्नेयास्त्र बने रहे ।

इसी तकनीक में बाद में कई बदलाव लाए गए जिसने बंदूक को लंबी दूरी पर अधिक सटीक बना दिया । मुख्य यह कि इसे पुनः लोड करने में अधिक समय लगा क्योंकि गोली को बैरल आगे बंदूक के मुँह से नीचे गिराना पड़ता था ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

व्हीललॉक सिस्टम गन (wheellock system gun) :

मैचलोक के बाद बंदूक का इतिहास में व्हीललॉक सिस्टम अगला प्रमुख गन की टेक्नोलॉजी थी । जिसमे इसमें गनपाउडर को जलाने के लिए जली हुई बाती या सुतली की जगह पर घर्षण-पहिया यंत्रवत चिंगारी उत्पन्न की जाती थी । ये मैचलोक गन की बराबरी में आसान और ज्यादा विश्वसनीय थी ।

इसे लगभग 1515 में विकसित किया गया था। ये पहली आत्म-प्रज्वलित (खुदसे जलने वाली ) बन्दूक थी । जोहान कीफस नाम के एक जर्मन बंदूकधारी को अक्सर 1517 में व्हीललॉक सिस्टम का आविष्कार करने का श्रेय दिया जाता था, हालांकि इसका बहुत कम प्रमाण है ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

इसे व्हीललोक इसलिए कहते हे क्योंकि यह प्रज्वलन प्रदान करने के लिए एक घूर्णन स्टील व्हील का उपयोग करता है ।

जैसे सिगरेट लाइटर में होता हे । इस व्हील का उपयोग करने से पहले चाबी का उपयोग किया जाता था । पहले बन्दुक के मुँह से बारूद और गोली को दबाके डाला जाता हे । इसके बाद व्हील के ऊपर के Flash pan पर बारूद या iron pyrite डाला जाता हे ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

wheel lock system gun

फ्लिंट को Flash pan के ऊपर खींच के दबाया जाता हे । ट्रिगर दबाने पर व्हील के घूमने से वह बारूद में चिंगारी होती हे जो आग्नेयास्त्र के बैरल में मुख्य आवेश(बारूद) को प्रज्वलित करने के लिए एक छोटे से छेद के माध्यम से चमकता है जिससे गोली छुटती हे । (look at wheel lock system gun clip)

एक व्हीललॉक बन्दूक को शूट करने के लिए तुरंत तैयार किया जा सकता है और एक हाथ से भी दागा जा सकता है । व्हील लॉक बन्दुक का यांत्रिक टेक्नोलॉजी काफी जटिल थी । जो इसे अपेक्षाकृत महंगा बनाता है । इसलिए ये इतिहास में काफी काम समय के लिए उपयोग किया गया । ज्यादातर आमिर लोग ही इसे खरीदना पसंद करते थे ।

व्हील लॉक के फायदे मैचलोक की तुलना में बारिश या नमी की स्थिति के लिए एक बेहतर प्रतिरोध थे । जलती हुई सुतली की जगह पे ट्रिगर दबाने पर ही स्पार्क होता था जिससे इसे कपडे के ऊपर पहना जा सकता था या अंदर छुपाया जा सकता था ।

व्हील लॉक और मैच लॉक सिस्टम के गन का उपयोग सरल और कम खर्चीले फ्लिंटलॉक फ्लिंट लॉक सिस्टम के आने से पहले साथ साथ में किया जाता था । आइये अगले फ्लिंटलॉक सिस्टम के बारे में जानते हे ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

फ्लिंटलॉक सिस्टम गन (Flintlock system gun) :

मैचलॉक बन्दूक का सच्चा उत्तराधिकारी फ्लिंटलॉक था । व्हील लॉक और मैचलोक का इस्तेमाल लगभग 100 वर्षों तक साथ साथ किया जाता रहा, और 17 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में फ्लिंटलॉक सामान्य उपयोग में आए ।

शरुआती फ्लिंटलॉक बन्दुक की शुरुआत 1610 से 1615 के आसपास हुई । इसका श्रेय अक्सर नॉरमैंडी के एक बहु-प्रतिभाशाली कारीगर मारिन ले बुर्जॉय को दिया जाता है, जिन्होंने किंग्स हेनरी चतुर्थ के राज्यदरबार में काम किया था ।

Flintlock gun

फ्लिंटलॉक का मूल विचार यह था कि चकमक पत्थर(Flint) का एक टुकड़ा स्टील के एक टुकड़े के साथ तेज प्रहार से संपर्क में लाया गया था, जिससे चिंगारी पैदा होती थी, जो तब एक पैन(Pan) में बारूद को प्रज्वलित करती थी, बदले में एक टचहोल के माध्यम से बंदूक की बैरल में पाउडर के चार्ज को प्रज्वलित करती थी । जिससे गोली छूटती हे ।

जब आप फ्लिंटलॉक के साथ काम करते हैं, तो फ्लिंटलॉक में हैमर के लिए तीन स्थान होते हैं: अनकॉक्ड, हाफ-कॉक्ड और पूरी तरह से कॉक्ड। पूरी तरह से कॉक्ड स्थिति में, बंदूक फायर करने के लिए तैयार है। हाफ-कॉक्ड स्थिति में, आप बंदूक लोड कर सकते हैं । बंदूक से फायर करने के बाद, यह अनकॉक्ड स्थिति में होता है ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

एक ऐसा सिस्टम जिसने किसी हथियार को तत्काल आवश्यकता में शूट करने की आवश्यकता से पहले लोड करने में सक्षम बनाया। यह स्पष्ट रूप से क्षेत्र में सैनिक के लिए बहुत बड़ा लाभ लेकर आया ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास) । फ्लिंटलॉक का उदय 17वीं और 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ ।

डॉगलॉक सिस्टम गन (Doglock system gun) :

एक डॉगलॉक आग्नेयास्त्रों के लिए एक प्रकार का सिस्टम है जो 17 वीं शताब्दी में राइफल्स, मस्केट और पिस्तौल में फ्लिंटलॉक से पहले था।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

फ्लिंटलॉक डिजाइन में कई विविधताएं थीं, जिनमें से सभी ने पैन में पाउडर को प्रज्वलित करने के लिए Frizzen के खिलाफ प्रहार करने के लिए चकमक पत्थर के टुकड़े का इस्तेमाल होता था जैसा हमने फ्लिंटलॉक की डिज़ाइन में देखा । 1600 के दशक के अंत के दौरान, अंग्रेज एक सरल फ्लिंटलॉक तंत्र, डॉगलॉक का इस्तेमाल किया ।

Doglock and flintlock
Doglock and flintlock

फ्लिंट लॉक की तुलना में निर्माण के लिए सरल होने के बावजूद इस डिज़ाइन में एक अतिरिक्त सुरक्षा विशेषता भी दी गयी। एक ‘डॉग’ कैच जो ‘हैमर ‘ के पिछले हिस्से में लगा हुआ था जब बंदूक हाफ-कॉक्ड स्थिति में था। जब हैमर को वापस ‘फुल-कॉक’ की तरफ खींचा गया तो डोगलॉक हट जाता हे और आप उसके बाद फायर कर सकते हे ।

Doglock system gun
Doglock system gun

इसका फायदा यह हुआ कि इससे यह सुनिश्चित हो गया कि बंदूक समय से पहले नहीं लगेगी क्योंकि ‘हैमर’ डॉग लॉक के द्वारा सुरक्षित था। कई बार ट्रिगर के गलती से दबने से अनचाहा फायर हो जाता था । लेकिन अब सिर्फ हैमर को पीछे खींचकर डॉगलॉक से मुक्त करने के बाद ही फायर होगा ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

केपलॉक सिस्टम गन (Caplock system gun) :

केपलॉक सिस्टम को लॉक मैकेनिज्म या पर्क्यूशन लॉक भी कहा जाता हे ।

अग्निशस्त्र में इसे में फ्लिंटलॉक मैकेनिज्म का वारिश माना जाता हे । स्टील के Frizzen पर प्रहार करने के लिए चकमक पत्थर के टुकड़े का उपयोग करने के बजाय, यह मुख्य आवेश(बारूद) को प्रज्वलित करने के लिए हैमर से टकराने वाली टक्कर टोपी(परक्युशन कैप) का उपयोग करता हे । निचे की इमेज में आप देख सकते हे ।

caplock system gun
caplock system gun

कैप लॉक सिस्टम को रेव अलेक्जेंडर जॉन फोर्सिथ द्वारा एक समाधान के रूप में विकसित किया गया था । अलेक्जेंडर जॉन को फ्लिंट लॉक में दो प्रॉब्लम थी । एक तो फ्लिंट लॉक में धुआँ निकलता था और दूसरा की इसमें ट्रिगर दबाने और गोली के बन्दुक में से छूटने के बिच के समय को कम करना था ।

इन दोनों समस्याए शिकार को आगाह कर देती थी । जिससे निशाना चूका जा सकता था । Forsyth ने 1807 में अपने इग्निशन सिस्टम का पेटेंट कराया। हालाँकि, Forsyth के पेटेंट की समय सीमा समाप्त होने के बाद तक पारंपरिक टक्कर कैप सिस्टम विकसित नहीं हुआ था।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

ब्रीचलोड सिस्टम गन (breechload system gun):

एक ब्रीचलोडर एक बन्दूक है जिसमें उपयोगकर्ता अपने बैरल के पीछे (ब्रीच) अंत के माध्यम से गोला-बारूद (कारतूस या खोल) को लोड करता है, जैसा कि बन्दुक के मुँह से लोड करने से विपरीत होता है, जो सामने बन्दुक के मुँह के माध्यम से गोला बारूद लोड करता है ।

Breechloading mechanism

अभी तक गोली और बारूद को बंदूक के आगे छेद से अंदर नुकीली लाठी या पाइप से भरा जाता था । लेकिन ब्रीच लोड सिस्टम से इसे उल्टा था । गोली के फायर होने के बाद लिवर को खींच कर केस (गोली का भाग) को बाहर निकला जाता हे ।

bullet
bullet

ब्रीचलोडिंग की सिस्टम में बुलेट , परक्युशन कैप और बारूद को एक साथ ही होता हे जिसे कारतूस(सामान्य भाषा में गोली जिसे कहते हे ) कहा जाता हे । (Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

breech loading gun

ब्रीचलोडिंग की सिस्टम कारतूस को अंदर डालने के बाद ट्रीगर से हैमर प्राइमर को हिट करता हे । जिससे कारतूस के अंदर का बारूद जलता होता हे । बुलेट बन्दुक में से निशाने पर लगता हे और बचा हुआ केस लिवर की मदद से बाहर निकाल दिया जाता हे ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

आज के समय में लगभग सभी बंदूकों में ब्रीचलोडिंग सिस्टम देखने को मिलती हे । हलाकि इसके इस्तेमाल के चलते इसके कई अलग अलग डिज़ाइन देखने को मिलते हे । ब्रीचलोडिंग में बहुत प्रगति हुई हे जिससे और विविधता देखने को मिलती हे जिसके चलते इसमें सिंगल शॉट गन , मल्तिशोट राइफल , सेमिऑटोमेटिक और ऑटोमेटिक राइफल देखने को मिलती हे ।

हमने ब्लॉगपोस्ट के शुरुआत में जो पिस्तौल के यंत्र-रचना को देखा वह ब्रीचलोडंग सिस्टम का ही उदाहरण हे । ब्रीचलोडंग सिस्टम वाली बन्दुक का आविष्कार 19 वि सदी में 1837 में Martin van wahrendorff के द्वारा हुआ था । Source

इसके आविष्कार का महत्वपूर्ण फायदा ये था की बाकि बन्दुक की बराबरी में इसका रिलोडिंग समय बहुत ही कम हो गया । क्यूंकि पहले बंदूक के मुँह से गोली बारूद को लम्बी ट्यूब में डालने और कसकर फिट करने में काफी समय लगता था । जिसके मुकाबले कारतूस को ब्रीच के माध्यम से बैरल में डालना आसान और तेज था ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

इसके आलावा ब्रेकलॉक की वजह से इसमे कारतूस को बाहरी वातावरण से भी बचाया जा सकता हे । इसे बारीश के समय भी इस्तेमाल किया जा सकता था और बंदूक को कही भी ले जा सकते थे ।

Conclusion

बंदूक का इतिहास ऐसे कई टेक्नोलॉजिकल बदलाव से गुजरा हे जिससे कई देशो के इतिहास को ही बदल दिया हे । जिसने युद्ध के मैदान का रुख और लड़ने के तरीको को पूरी तरह से बदल दिया । जो इन चीजों को इस्तेमाल करना और इनमे नई खोज करना जानते हे वो ही दुश्मन से दो कदम आगे रहते हे और जित हासिल करते हे ।

आशा करता हूँ आज का पोस्ट में आपको बंदूक का इतिहास के बारे में काफी कुछ जानकारी प्राप्त हुई होगी । बंदूक का इतिहास के अलाव आज हमने बन्दुक की रचना के बारे में भी जाना । ये समझा की ये काम कैसे करती हे । और देखा की बन्दुक की टेक्नोलॉजी में कोन कोन से बदलाव आये ।(Blogtopic : बंदूक का इतिहास)

ऐसी ही विज्ञानं से जुडी जानकारी के लिए sciencegyani ब्लॉग पढ़ते रहे । ब्लॉगपोस्ट पसंद आये तो लाइक , सब्सक्राइब और कमेंट जरूर करे । और जानकारी के लिए निचे दिए गए दिलचस्प ब्लॉगपोस्ट को पढ़े । धन्यवाद

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